बिन सपनो का जीवन

आँख-मिचौली खेलती मुझसे मेरा ही जीवन
निश्चय कर न पाए किस उलझन में है मन
जब कभी ठहराव मिला कदम उठा आगे बढ़ा
एक नए दो-राहे पे ला खड़ा किया ये जीवन

जगमग डगर शहर की अँधेरी गाँव की पगडण्डी
इस रात और दिन के भ्रम में क्यों पिसता जीवन
आगे एक कदम पीछे आधा होता हर क्षण
छोड़ मोह को फिर से उलझता क्यों ये मन

सपनो का एक शहर है प्यारा
न्योछावर है उसपर मेरा तन-मन
ये किस असमंजस में डाले हर बार मुझे तू
जी लूँ कैसे बिन सपनो का जीवन
-चन्दन

आज अगर बारिश न होती...(14th Feb)

आज अगर बारिश ना होती तो क्या होता?
दो प्रेमी मिलते पार्क में जन्मो के कसमे खाने को?
शिव सेना आती लठ्ठ लेकर संस्कृति का उधम मचाने को!
समाचार विशलेषण करती "सभ्यता का मतलब क्या है?"
प्रेम होता है क्या खुलेआम जिस्म मिलाने को?

आज अगर बारिश ना होती तो क्या होता?
दो-चार खून खराबे होते, नेताओ के भाषण होते,
समाजसेवी सजा सुनाते, कान पकड़ उठ-बैठ कराते,
प्रेमी-प्रेमिकाओं में वो भाई-बहिन का प्रीत जगाते!

क्या एक ही दिन बचा है साल में देशभक्त के जागने को?
भगत सिंह को याद करने और मातृ पूजा करने को?
क्या एक दिन ही शेष बचा है बरस में,
जग को इजहार प्यार का करने को?

ज्योति जब गुडिया बनी थी समाजसेवी कहाँ गए थे?
देशभक्त औ शिव शेना लठ लेकर कहाँ खड़े थे?
आचरण घर में ना सीखा गर बाहर क्या व्यव्हार करेगा?
लाज़ घर का न बचा सका जो देश का क्या उद्धार करेगा?

अरे मुरख! खुद को संभाल तू दुनिया भी सुधर यूँ जाएगी!
आज़ादी का मतलब समझ तू प्रेमी स्वीकार्य हो जाएगी!
-Chandan

कैसे भुला पाओगे तुम

माना कि नज़रें न कभी मिलेगी हमारी
पर क्या खुद से नज़रे मिला पाओगे तुम
शीशे में जमाल निहारते अपनी
मेरी छुअन नज़र अंदाज़ कर पाओगे तुम

बदलते रिश्ते तुम्हे खुश करले कितना भी
पर बीते लम्हे कैसे भुला पाओगे तुम
शरारत भरी निगाह से यूँ न देखो मुझे
क्षण-पल ये कहते खुद को पाओगे तुम

गुमराह था मैं यकीं तो अब भी नहीं होता
गुनेहगार कातिल को कैसे ठहराओगे तुम
सुहाना हो तेरा शौक-ए-शफर कितना भी
वो दिलचस्प एहसास कैसे भुला पाओगे तुम

जब भी आएगी शब् चांदनी समेटे बाहों में
मेरे नज़्म युहीं गुनगुनाओगे तुम
जो अलफ़ाज़ रिसा आगोस में तेरे "चन्दन"
वो लफ्ज़-ए-जज्बात कैसे भुला पाओगे तुम

- Chandan Kumar Gupta

खूबसूरती में कमी नहीं

खूबसूरती में कमी नहीं
सौ घूरती नज़रें गवाही है
पर दिल को भाता क्यों नहीं
किया ऐसा क्या इश्क़ उगाही है

आँखें है तुम्हारी मयखाना
पर नशा ये चढ़ता क्यों नहीं
नज़रें मिलती है क्षण भर को
पर बात बढ़ती ये आगे क्यों नहीं

मुशफिर हो तुम मैं भी हूँ
पर राह कटती ये पल में क्यों नहीं
मंजिल पे बिछड़ हम जायेंगे
मुस्कान राहों हो मनाही तो नहीं

मिले जो गर हम फिर कभी
नज़रें न चुराए पाये हम
यादों का बनाना मुमकिन है
तेरे दिल को भी शिकायत तो नहीं

- Chandan Kumar Gupta

In the morning at 5

In the morning at five
when the world takes sigh
walking in street light
gives feel of future bright

when sweeper sweeps
horn gives a slow beeps
I wonder on the road
in my city in the hope

path says me go ahead
keeping goal in your head
something be always missing
leave the rest goal is kissing

when you find no one around
own efforts will make sound
leave no space for regret
forget luck else luck forget

-Chandan Kumar Gupta