जवाब ढूंढ रहा हूँ मैं

आज बारिश आई मेरे तकियों तले
आगोश में अपनी कुछ यादें लिए
सहेजा था हमने जिसे बड़े चाव से
नज़रो ने गिरा दिया ज़माने के दाव से
नींदों से अपनी वापस लौट रहा हूँ मैं
ख्वाबों को अपने हाल पे छोड़ रहा हूँ मैं
माँगा बारिश ने जवाब मेरी तन्हाइयों का
जिसे बादलों से टूटते देख रहा हूँ मैं
वो चेहरा दिखता है बादलों में अब भी मुझे
जिसके नाम का मतलब लिख रहा हूँ मैं
उम्मीद होगी बारिश को फिर से बादल की
सवालो के जवाब में फिर सवाल कर रहा हूँ मैं
ये मौसम होता था पैगाम हमारी मोहब्बत का
नज़राने में उसका इत्तेफ़ाक़ सुन रहा हूँ मैं
सवाल जो कभी न पूछ सका मैं उससे
उसी सवालों का जवाब ढूंढ रहा हूँ मैं
सप्रेम- चन्दन

लौट कभी ना वापस आऊंगा

अरमान मिलन के दबें है मन में,
साथ इसे ले कुछ कर जाऊँगा
दूर बहुत तुमसे जाकर मैं,
लौट कभी ना वापस आऊंगा...
तू मुझ बिन मैं तुम बिन,
जैसे है चाँद चकोरी के बिन
इस जहाँ के रीत निभाते,
चाह में तेरी मिट जाऊँगा...
दूर बहुत तुमसे जाकर मैं,
लौट कभी ना वापस आऊंगा...
होंगें ऐब लाखों मुझमे,
प्यार कभी भी ना कम होगा
साथ चले गर चार कदम तू,
खामियां भी दफना जाऊँगा...
अरमान तुम्हारे होंगे दुल्हन से,
मनिहार सा सजा जाऊँगा
पर बैर न रखना मुझसे प्रिये तुम,
तारों सा ओझल हो जाऊँगा...
दूर बहुत तुमसे जाकर मैं,
लौट कभी ना वापस आऊंगा...
निश्चित काल में चाँद को देखना,
थकते दम तक जुड़ों का बदलना
अधसोई अधजगी पलकों पर,
याद तुम्हे मैं दिला जाऊँगा...
दूर बहुत तुमसे जाकर मैं
लौट कभी ना वापस आऊंगा...
♥ चन्दन Chandan چاندن ♥

बिन सपनो का जीवन

आँख-मिचौली खेलती मुझसे मेरा ही जीवन
निश्चय कर न पाए किस उलझन में है मन
जब कभी ठहराव मिला कदम उठा आगे बढ़ा
एक नए दो-राहे पे ला खड़ा किया ये जीवन

जगमग डगर शहर की अँधेरी गाँव की पगडण्डी
इस रात और दिन के भ्रम में क्यों पिसता जीवन
आगे एक कदम पीछे आधा होता हर क्षण
छोड़ मोह को फिर से उलझता क्यों ये मन

सपनो का एक शहर है प्यारा
न्योछावर है उसपर मेरा तन-मन
ये किस असमंजस में डाले हर बार मुझे तू
जी लूँ कैसे बिन सपनो का जीवन
-चन्दन

आज अगर बारिश न होती...(14th Feb)

आज अगर बारिश ना होती तो क्या होता?
दो प्रेमी मिलते पार्क में जन्मो के कसमे खाने को?
शिव सेना आती लठ्ठ लेकर संस्कृति का उधम मचाने को!
समाचार विशलेषण करती "सभ्यता का मतलब क्या है?"
प्रेम होता है क्या खुलेआम जिस्म मिलाने को?

आज अगर बारिश ना होती तो क्या होता?
दो-चार खून खराबे होते, नेताओ के भाषण होते,
समाजसेवी सजा सुनाते, कान पकड़ उठ-बैठ कराते,
प्रेमी-प्रेमिकाओं में वो भाई-बहिन का प्रीत जगाते!

क्या एक ही दिन बचा है साल में देशभक्त के जागने को?
भगत सिंह को याद करने और मातृ पूजा करने को?
क्या एक दिन ही शेष बचा है बरस में,
जग को इजहार प्यार का करने को?

ज्योति जब गुडिया बनी थी समाजसेवी कहाँ गए थे?
देशभक्त औ शिव शेना लठ लेकर कहाँ खड़े थे?
आचरण घर में ना सीखा गर बाहर क्या व्यव्हार करेगा?
लाज़ घर का न बचा सका जो देश का क्या उद्धार करेगा?

अरे मुरख! खुद को संभाल तू दुनिया भी सुधर यूँ जाएगी!
आज़ादी का मतलब समझ तू प्रेमी स्वीकार्य हो जाएगी!
-Chandan

कैसे भुला पाओगे तुम

माना कि नज़रें न कभी मिलेगी हमारी
पर क्या खुद से नज़रे मिला पाओगे तुम
शीशे में जमाल निहारते अपनी
मेरी छुअन नज़र अंदाज़ कर पाओगे तुम

बदलते रिश्ते तुम्हे खुश करले कितना भी
पर बीते लम्हे कैसे भुला पाओगे तुम
शरारत भरी निगाह से यूँ न देखो मुझे
क्षण-पल ये कहते खुद को पाओगे तुम

गुमराह था मैं यकीं तो अब भी नहीं होता
गुनेहगार कातिल को कैसे ठहराओगे तुम
सुहाना हो तेरा शौक-ए-शफर कितना भी
वो दिलचस्प एहसास कैसे भुला पाओगे तुम

जब भी आएगी शब् चांदनी समेटे बाहों में
मेरे नज़्म युहीं गुनगुनाओगे तुम
जो अलफ़ाज़ रिसा आगोस में तेरे "चन्दन"
वो लफ्ज़-ए-जज्बात कैसे भुला पाओगे तुम

- Chandan Kumar Gupta