गम-ए-तन्हाई

शहर की भीड़ में तन्हाई बिजली सी कड़कती है
और कहती है तन्हाई इस भीड़ को देखकर
'इतने सारे लोगों में तेरा अपना यहाँ पे कोई नहीं
ढल जाएगी ये शाम युहीं इक हमदर्द की तलाश में
कट जाएगी ये जिन्दगी युहीं आबडू की भड़ास में
तू भी इस भीड़ का इक हिस्सा बनकर रह जायेगा
अंतिम यात्रा पे तू भी खाली हाथ ही जायेगा
फिर क्यूँ तू किसी से कुछ उम्मीद करता है
जीता यहाँ वो भी है जो यतीम होता है'
जानते हैं सबकुछ मानते हैं सबकुछ फिर भी मगर
जाने क्यों युहीं मन किसी के ख्यालों में रमती रहती है
शहर की भीड़ में तन्हाई बिजली सी कड़कती है...
                       Written By:-
                    Chandan Kumar Gupta

क्यों नहीं

ख्वाब कभी हकीकत बन जाती क्यों नहीं
गर है वो हमारी तो जताती क्यों नहीं
दूरियां बढाकर तडपाती है खुद को
मिलना ही है गर मुझसे तो पास आती क्यों नहीं
सपनो में रोज मेरी सहजादी बनकर आती है
हकीकत में पर्दा कभी उठती क्यों नहीं
कहते तो हैं की वो सिर्फ हमारे हैं
फिर अपनों की तरह वो मुझे सताती क्यों नहीं
मेरी हर इक खबर रहती है उनके पास
फिर अपनी खबर मुझे वो बताती क्यों नहीं
तडपाती है मुझे वो मुझे अपनी दुश्मन की तरह
गर इरादा है नेक तो खुलेआम बोल पाती क्यों नहीं
ख्वाब कभी हकीकत बन जाती क्यों नहीं
गर है वो हमारी तो जताती क्यों नही
          Written By:-
       Chandan Kumar Gupta
ं

डर लगता है

दरवाज़ा खुला है इन्तजार मे उनके
डर लगता है दस्तक दरवाज़े पे किसी और की न हो
तसस्वुर मे खोया रहता हूँ मै  उनके
डर लगता है दस्तक दिल पे उनकी किसी और की न हो
दौर लगाता हूँ वक्त के साथ हर कदम पे
डर लगता है साथ उनका न छुट जाए वक्त की दौर मे
उँचा बहुत उँचा जाने के सपने देखता हूँ
डर लगता है कहीं फिसल न जाउँ इस चाहत मे
शौक बदलने का  सपने को हकीकत मे है पुराना मगर
डर लगता है चंद खुशनुमा हकीकत सपने न बन जाए
सिकवे उन्हे भी है गिला हमे भी है बेशक मगर
डर लगता  है दुरियाँ न जीत जाये जिद्द की जंग मे
                      Written by:-
              Chandan Kumar Gupta

यूहीं

सोचता हूँ यूहीं कभी मैं,
है मेरी गलती या हूँ मजबूर मैं,
अलावा अपने स्वार्थ के क्यों हूँ बेक़रार मै,
है ये मेरी बड़प्पन या है बेवकूफी मेरी
कि सह रहा हूँ हर सितम बिन सवाल मै,
आश है नजराना का बदले अपने त्याग के,
मिलेगी हर चाहत या हो जाऊंगा कसूरवार मैं,
जद्दो-जिहदके इस जीवन में उम्मीद है इक लौ की,
मिले न ग़र वो हमे मर जाऊंगा बेनूर मै,
सोचता हूँ युहीं कभी मै...
         Written By:-
Chandan Kumar Gupta


वो

शाम आई और गुजर गयी अधूरेपन का एहसास देकर
बैठा रहा मै इंतज़ार में दिल जुड़ने की आश लेकर
दिल जुड़े न जुड़े कोई गम नहीं हमे अब
आह भरा मैं तब जब कोई कह गया पराया खास बनकर
महज नाम जुड़ने भर से डरती वो मेरा रकीब से
अब तो जुदा कर देती है मेरा नाम अपने नाम से वो दोस्त कहकर
चाँद को देखकर हर रात करता था दीदार जिसका मै
मेरे जीवन में वो रहना चाहती है महज इक दाग बनकर
कहने को मेरी कहानी चाँद लफ़्ज़ों की मोहताज़ है
पर दोहराने पे उसकी हर बात डसती मुझे नाग बनकर
कहता है इक मन मेरा मिटा दे उसकी हर यादों को
कैसे समझाउं दिल को मै बसी है मेरे धड़कन में वो साँस बनकर
           Written By:-
        Chandan Kumar Gupta