फसादी हूँ मैं

जब इच्छाएं ख़त्म हो जाती है
दुःख दर्द नादानी लगती है
उस मुकाम का आदी हूँ मैं
खुद पर विजय का वादी हूँ मैं

धर्म जब नौटंकी लगे
कर्म एकमात्र संगी लगे
ज़िद्द है अतिवादी हूँ मैं
अनसुलझा मियादी हूँ मैं

गलत से समझौता नहीं
अपनों सा सरौता नहीं
यूँ डरता हूँ लड़ाई से
हर क्षण प्रतिवादी हूँ मैं

ज़मीर गर इज़ाज़त न दे
विरोध में इकलौता हूँ मैं
फसाद हो गर वसूलों से
हाँ हाँ फसादी हूँ मैं

♥ चन्दन Chandan چاندن ♥


जरुरी तो नहीं

ख्वाबों का होना लाज़मी है
ताबीर एक हो जरुरी तो नहीं
गुज़ारिश मेरी मुख़्तसर ही सही
रहमत तेरी हो जरुरी तो नहीं

फ़र्ज़ नहीं ये हिमायत है
जिस लफ्ज़ से तुझको शिकायत है
शिगाफ़ सीने में है छुपी
एहसास हो तुमको जरुरी तो नहीं

एहसास है मुझको गुरुर नहीं तुझको
मगरूर होने की पर मज़बूरी तो नहीं
ज़माना तंगमिज़ाज़ी है सदियों से
रिश्ते भी हो तंग जरूरी तो नहीं

लेखन: Chandan चन्दन چاندن

तेरा शहर

तेरे शहर की कुछ बात अलग है
लोग हैं वही जज़्बात अलग है
हक़ीक़त है लोगों पे राय मेरी,
या मेरे नज़रों पे चस्मात अलग है?
कुछ अलग तो नहीं मेरा शहर तेरे शहर से
मय नज़्र की खिंचती है यहाँ भी सड़क से
फिर तेरे शहर से क्यों मेरे तालुकात अलग है?
तेरा शहर में होने का शायद अर्थात अलग है
धूल मिट्टी के कण चलायमान है दोनों शहर में
गंदगी और पीड़ा विराजमान है दोनों शहर में
तुम्हारे सिवा तेरे शहर की औकात विरल है
तुम दर्द में भी मिलो तो दर्द का उन्माद अलग है
गर रुखसत हो सको अपने शहर से मेरे शहर में
बचेगा न कुछ अवशेष के सिवा तेरे शहर में
तेरा साथ और जज्बात के बिना क्या अलग है ?
कोई और भी हो खास किसी का तो बात अलग है
सप्रेम लेखन: चन्दन Chandan چاندن

मझधार

ज़िन्दगी दो या मौत दे दो!
घुटन हमसे सहा नहीं जाता!!
आ जाओ या चले जाओ!
इंतज़ार अब किया नहीं जाता!!
ख्वाब दो या हक़ीक़त दो!
दिलासा दिल को दिया नहीं जाता!!
हाँ कहो या ना कहो!
"पता नहीं" अब सुना नहीं जाता!!
इश्क़ हो या फिर न हो!
दिल गैरों को गिरवी दिया नहीं जाता!!
तुम रहो या कहानी रहे!
यादों का बोझ ढोया नहीं जाता!!
तनहा रहूँ या साथ रहूँ!
दुरी अब हमसे सहा नहीं जाता!!
हार मानूँ या जीत लूँ!
सिक्का हमसे उछाला नहीं जाता!!
आर रहूँ या पार रहूँ!
मझधार मगर रहा नहीं जाता!!
अच्छा बनूँ या बुरा बनूँ!
दो चेहरा हमसे रखा नहीं जाता!!
आग लूँ या बैराग लूँ!
"चन्दन" अब हमसे घिसा नहीं जाता!!

सप्रेम लेखन : चन्दन Chandan چاندن

बदनसीब

दूर थे जब तुम, मेरे सबसे करीब थे
जज्बात तेरे सारे, मेरे भी अज़ीज़ थे
मिल न सकी थी नज़रे कभी हमारी
पर नज़्र में सिर्फ तुम ही शरीक थे
सिमटी थी दुनिया एक दूजे की हद तक
ख्वाबों में जीते थे, न कोई हबीब थे
याद आते हैं अब भी वो बीते पल
कि दूर होकर भी हम कितने करीब थे
समझ न सका जो आगाज़ थी तन्हाई की
ख़ामोशी से पहले शोर थी शहनाई की
रश्में जुदाई ही निभाई जाये ये जरुरी तो नहीं
जहाँ गोत्र आबरू बने, मिलन कहाँ नसीब थे
रुतवा अपने अपने है सबके उपनामो में
समाज के इस बंधन से हम कहाँ अछूत थे
बस इतनी इल्तज़ा है दिल में रहे इक दूजे के
भूले कभी न वजह, कि हम क्यों बदनसीब थे
सप्रेम लेखन: चन्दन Chandan چاندن