मझधार

ज़िन्दगी दो या मौत दे दो!
घुटन हमसे सहा नहीं जाता!!
आ जाओ या चले जाओ!
इंतज़ार अब किया नहीं जाता!!
ख्वाब दो या हक़ीक़त दो!
दिलासा दिल को दिया नहीं जाता!!
हाँ कहो या ना कहो!
"पता नहीं" अब सुना नहीं जाता!!
इश्क़ हो या फिर न हो!
दिल गैरों को गिरवी दिया नहीं जाता!!
तुम रहो या कहानी रहे!
यादों का बोझ ढोया नहीं जाता!!
तनहा रहूँ या साथ रहूँ!
दुरी अब हमसे सहा नहीं जाता!!
हार मानूँ या जीत लूँ!
सिक्का हमसे उछाला नहीं जाता!!
आर रहूँ या पार रहूँ!
मझधार मगर रहा नहीं जाता!!
अच्छा बनूँ या बुरा बनूँ!
दो चेहरा हमसे रखा नहीं जाता!!
आग लूँ या बैराग लूँ!
"चन्दन" अब हमसे घिसा नहीं जाता!!

सप्रेम लेखन : चन्दन Chandan چاندن

बदनसीब

दूर थे जब तुम, मेरे सबसे करीब थे
जज्बात तेरे सारे, मेरे भी अज़ीज़ थे
मिल न सकी थी नज़रे कभी हमारी
पर नज़्र में सिर्फ तुम ही शरीक थे
सिमटी थी दुनिया एक दूजे की हद तक
ख्वाबों में जीते थे, न कोई हबीब थे
याद आते हैं अब भी वो बीते पल
कि दूर होकर भी हम कितने करीब थे
समझ न सका जो आगाज़ थी तन्हाई की
ख़ामोशी से पहले शोर थी शहनाई की
रश्में जुदाई ही निभाई जाये ये जरुरी तो नहीं
जहाँ गोत्र आबरू बने, मिलन कहाँ नसीब थे
रुतवा अपने अपने है सबके उपनामो में
समाज के इस बंधन से हम कहाँ अछूत थे
बस इतनी इल्तज़ा है दिल में रहे इक दूजे के
भूले कभी न वजह, कि हम क्यों बदनसीब थे
सप्रेम लेखन: चन्दन Chandan چاندن

मेरे शहर में

पैसे हो तो रिश्तेदार बहुत हैं
कृषक नहीं पर ज़मीदार बहुत हैं
वृद्धाश्रम की कमी नहीं मेरे शहर में
बेऔलाद अमीरों के वफादार बहुत हैं
घर में हो बेटी अपने तो संस्कार बहुत है
खूबसूरत हसीनाओं के तरफदार बहुत हैं
घर की बच्चियां भले न पढ़ पाये बहुत
सुशिक्षित हसीनाओं के हक़दार बहुत हैं
मरता है हर दिन ठंढ से ठिठुर कर कोई
मखमली चादरों के मज़ार बहुत हैं
समाजसेवा भी पेशा है यहाँ पर
लालबत्ती पर बच्चे लाचार बहुत हैं
चमकती है सड़कें भी चुनकर इलाकों को
बस्तियों में कूड़ों का अम्बार बहुत है
हरियाली पे पैसे उड़ाती हो सरकार भले
नवीनीकरण में होती शिकार बहुत है
डिग्रियों का मीना बाजार पसरा है यहाँ
सुना था दिल्ली में रोजगार बहुत है
चुप होता हूँ जब भी किसी खामियों पे
लोग कहते हैं "चन्दन" होशियार बहुत है
सप्रेम लेखन: चन्दन Chandan چاندن

ज़ख्म हरा कर देती है

भुला के राह-ए-इश्क़ तेरा मान तो रख लूँ
तेरी खामोश सिसक ज़ख्म हरा कर देती है
न देखती मुड़कर मुझे तो बात अलग थी
नजरें मिला के फेर लेना ज़ख्म हरा कर देती है

चिंगारी बुझ गई होती उल्फत-ए- ख्वाब के मेरे
तेरा अरसे पे मिल जाना ज़ख्म हरा कर देती है
नफ़रत ही सही पेश कर दो बेबाकी से
तेरा खामोश रह जाना ज़ख्म हरा कर देती है

झूठ बोलती है परिजन से मुझसे दो बातें करने को
विदाई पे अनछुआ-बोसा ज़ख्म हरा कर देती है
हर सुबह होती है गलतफहमियां जी लूंगा तेरे बिन
रैन ख्वाबों में तेरे जीना ज़ख्म हरा कर देती है

तोड़ भी लेती बंधन इश्क़ के राह नहीं धूमिल होता
इंकार इकरार की दुविधा ज़ख्म हरा कर देती है
किस्मत में हो ग़र आ जाओ बिन आजमाइश के
हर घड़ी हर क्षण तड़पाना ज़ख्म हरा कर देती है

सप्रेम लेखन: चन्दन Chandan چاندن

क्या समझूँ

तेरी बेरुखी को मैं क्या समझूँ
महज़ संयोग या साज़िश समझूँ
यकीं नहीं आता अपनी ही किस्मत पे
किस्मत कहूँ या तेरा एहसां समझूँ

साज़िश खुद ही रचते हो
फिर रास्ता तुम ही गढ़ते हो
इत्तेफाक के इस पुलिंदे को
इश्क का कौन कायदा समझूँ
तेरी बेरुखी को मैं क्या समझूँ

एहसास इश्क़ का ही था
कि चाँद में चेहरा दिखता था
वरना ब्रह्माण्ड के ग्रह उपग्रह में
बिम्ब प्रतिबिम्ब मैं क्या समझूँ
तेरी बेरुखी को मैं क्या समझूँ

सहनशीलता सीखी है मैंने
अपने घर के सरकारों से
मतलब की है दुनिया सारी
रिश्ते नाते मैं क्या समझूँ
तेरी बेरुखी को मैं क्या समझूँ

सप्रेम लेखन: चन्दन Chandan چاندن